Blog,  Fiction

A Hindi Short Story On Lockdown and Teaching

Happy Teachers Day!!

दोपहर के खाने के बाद पल्लवी इधर-उधर बिखरा सामान  समेटने में लग गई थी लेकिन काम करते हुए वह मन ही मन मानो खुद से बातें कर रही थी, “जहां देखो वहीं लोग स्कूलों की फ़ीस भरने से पीछे हट रहे हैं। यह भी कोई बात हुई कि, जब स्कूल लगी नहीं रहे तो फ़ीस क्यों दी जाए। अरे! ये कोई सब्ज़ी मंडी है क्या जो मोल भाव हो रहा है। और उसका क्या जो रोज़ online classes हो रहीं हैं? हैं!!

सारा सारा दिन बावरों की तरह पढ़ाई, होमवर्क, टेस्ट हो रहे हैं, वो कुछ नहीं?

पल्लवी आज सुबह से यूं ही बड़बड़ा रही थी, उसकी बातें सुन कर उसके पति शेखर ने  विरोधी भाव से उल्लास करते हुए कहा: हां तो ठीक ही तो है ना, बच्चे स्कूल जा ही नहीं रहे तो फ़ीस किस बात की।

पल्लवी शेखर कि ओर मुड़ते हुए बोली: बड़ी अजीब सी बात है वैसे, हम सब इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, कि शिक्षा के बगैर एक व्यक्ति बिल्कुल अधूरा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे बिना प्राण के हड्डी मास का ढाँचा, शिक्षा हमारे व्यक्तित्व में प्राणवायु की तरह काम करती है और शिक्षक इस प्राणवायु का स्त्रोत है। इतना महत्वपूर्ण किरदार होने के बावजूद भी आज शिक्षक समाज में अपने जायज़ सम्मान के लिए भी हाथ फैलाता क्यों नज़र आ रहा है?

शेखर: वैसे आज तुम इस बात पर इतना क्यों भड़क रही हो?

पल्लवी: यूं तो गुरु का हमारे इतिहास में बहुत खास स्थान रहा है, यहां तक की हमारे विद्वानों ने गुरु को ईश्वर के स्थान पर रखा है।

"गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः
गुरुः साक्षात्परब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः"
अर्थात:
गुरुर ब्रह्मा : गुरु ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) के समान हैं.
गुरुर विष्णु : गुरु विष्णु (संरक्षक) के समान हैं.
गुरुर देवो महेश्वरा : गुरु प्रभु महेश्वर (विनाशक) के समान हैं.
गुरुः साक्षात : सच्चा गुरु, आँखों के समक्ष
परब्रह्म : सर्वोच्च ब्रह्म
तस्मै : उस एकमात्र को
गुरुवे नमः : उस एकमात्र सच्चे गुरु को मैं नमन करता हूँ.

ये कहते हुए पल्लवी का गला भर गया और आंखों से अश्रु धारा बहने लगी।

शेखर भी पल्लवी के भाव देख कर भावुक हो उठे और पल्लवी को अपने साथ आराम से बैठा कर पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए फिर पूछा…

आखिर हुआ क्या है पल्लवी?

तुम इतनी परेशान क्यों हो, हमने तो अपने बच्चों की फ़ीस जमा करवा दी है यार।

पल्लवी एक घूंट पानी अपने हलक से उतरते ही बोली, मुझे माफ़ कर दीजिए शेखर मैं आपको कुछ नहीं कहा रही हूं, मुझे पता है कि आपने इस बात का कभी विरोध नहीं किया है, पर….

पर? शेखर ने फिर जिज्ञासु स्वर में पूछा…

आज सुबह मैं अपनी मित्र रोमा के वर्कशॉप पर गई थी।

रोमा!! वही ना जो एक गैर सरकारी संस्थान चलाती है और कभी कभी लोगों से पुराने कपड़ों और दूसरे समान इकठ्ठे करके उन्हें गरीब लोगों में बांट देती है, शेखर ने पहचानते हुए कहा।

पल्लवी: जी हां वही! मैं हमारे कुछ पुराने कपड़े वहां देने गई थी कि शायद किसी के काम आ जाएंगे।

वहां एक महिला आई और रोमा से कुछ काम कि अपेक्षा करने लगी।

रोमा ने उससे उसके बारे में पछा तो उस महिला की बात सुन कर मेरे पैरों तले से ज़मीन खिसक गई।  यहां तक कि कुछ पल के लिए मुझे इस समाज का हिस्सा होने पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी।

इस बात को कोई नकार नहीं सकता कि लॉकडाउन के प्रथम चरण से ही बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा चल रही है। शिक्षक हर संभव तरीके से सभी बच्चों को अपने साथ जोड़ कर घर बैठे ही ज्ञान बांट रहे हैं। हमारे बच्चों का समय और उनके मानसिक विकास में किसी भी तरह की बाधा या अड़चन ना आए इसके लिए इंटरनेट के सहयोग से शिक्षक रोज नए नए तरीकों से बच्चों को पढ़ा रहे हैं। 

सामान्य रूप से क्लास रूम में एक साथ 40- 50 बच्चों को एक साथ कोई पाठ पढ़ाना, उन्हें सिखाना, डांटना, समझाना, परीक्षाएं लेना और फिर उन सब का आंकलन कर आगे बढ़ना, यही तरीका चलता आया है।

पर हमारी इस शिक्षा प्रणाली से बिल्कुल पृथक आज के इस तरीके से हर किसी को उनके घर में बैठे हुए ही technology की मदद से हर रोज़ हमारे बच्चों को पढ़ना कोई आसान काम नहीं है।

जहां अब तक अपने विषय को पढ़ाने के लिए शिक्षकों को समय-समय पर लेसन प्लान तैयार करने होते थे वहीं अब न सिर्फ लेसन प्लान बल्कि प्रत्येक पाठ के हिसाब से audios, vedios, photos और न जाने क्या-क्या तैयार करके विषय से संबंधित कई उदाहरणों को YouTube links जैसे कई संसाधनों का प्रयोग कर विद्यार्थियों को हर संभव कोशिश से विषय वस्तु समझाने में लगे हैं।

ध्यान से देखा जाए तो यह बिल्कुल भी आसान नहीं है क्योंकि एक दशक पहले के शिक्षकों को technology को इस तरह से इस्तेमाल करना नहीं आता, ऐसे में वे अपनी क्षमताओं से बहुत आगे तक सोचने के लिए तैयार हैं और नई पीढ़ी को नए तरीकों से पढ़ाने के लिए तत्पर हैं।

यहां तक की online परीक्षाएं भी ली जा रही हैं, group video calling के माध्यम से online classes लेकर  हर बच्चे की प्रस्तुति का आंकलन भी किया जा रहा है।

इसके अलावा यह भी एक बहुत बड़ी चुनौती है कि आज शिक्षक और छात्र के बीच के संबंध एवं वार्तालाप का पूरा सीधा प्रसारण अभिभावक भी देख सकते हैं ऐसे में शिक्षकों के ऊपर बहुत बड़ा दायित्व है कि वह हर हालत में अपने व्यवहार एवं भाषा का संतुलन बनाकर चलें।

शेखर चुप-चाप पल्लवी की हर बात सुन रहे थे और मन ही मन इन बातों की गहराई को महसूस भी कर रहे थे।

पल्लवी:  इतना सब कुछ करने के बाद, यदि वे अपने हक की कमाई की अपेक्षा कर रहे हैं तो इसमें गलत क्या है?

केवल मात्र यह कि स्कूलों के दरवाज़े बंद हैं और हमारे बच्चे युनिफ़ॉर्म पहनकर, बसते टांगे सड़कों पर धक्के खाते स्कूल नहीं पहुंच रहे हैं, इसलिए हम उनकी आए देने के लिए तैयार नहीं हैं।

कम से कम इतना तो सोचना ही चाहिए कि चाहे दुनिया बंद हो गई है लेकिन फिर भी पेट की भूख को दबाया नहीं जा सकता।

इंसान अपने कई शौक मार सकता है परंतु अपने जीवन की मूल आवश्यकताओं को बिल्कुल नकार नहीं सकता और चाहे जो भी हो जाए बाजार से कुछ भी खरीदने के लिए जेब में पैसे तो चाहिए ही।

जब हम अपने परिवार का पेट पालने के लिए अपनी आय संभालकर आहिस्ता आहिस्ता ज़रूरतों को पूरा करने में खर्च कर रहे हैं तो हमें ऐसा क्यों नहीं सोचना चाहिए कि शिक्षक, जो रात दिन मेहनत करके नित नए पाठ तरह तरह से तैयार करके हमारे बच्चों को पढ़ाने में लगे हैं उनकी मेहनत की कीमत तो हम चुका ही नहीं सकते परंतु कम से कम उनके हक की कमाई स्कूल की फ़ीस जमा कराके तो दे ही सकते हैं।

ऐसा करके हम उन पर कोई एहसान नहीं कर रहे बल्कि हम उनके प्रति अपनी ज़िम्मेदारी ही तो पूरी करेंगे ना।

शेखर ने पल्लवी का हाथ पकड़ कर उसकी राय में सहमति प्रदान करते हुए अपना सर हिलाया फिर एक गहरी सांस लेते हुए पूछा उस महिला की क्या कहानी थी?

पल्लवी उठकर खिड़की की ओर चली गई बाहर प्रकृति की ओर देखते हुए बोली: 

उस महिला ने रोमा से कहा, “दीदी मैंने सुना है कि आप यहां गरीब महिलाओं को अपने साथ जोड़ कर समाज सेवा का कुछ काम करती हैं और उस काम के बदले आपके साथ काम करने वाली महिलाओं को कुछ पैसा देती हैं यदि आपके पास जगह खाली हो तो कृपया मुझे अपने साथ जोड़ लीजिए।”

रोमा ने उस महिला से पूछा, “कि तुमने कभी कहीं काम किया है, मेरा मतलब है तुम्हें किस तरह के काम का तजुर्बा है?”

यह बात सुनकर उस महिला की आँखें नम हो गई और वह कहने लगी: “दीदी! मैं और मेरे पति पास के एक विद्यालय में अध्यापक के रूप में काम कर रहे थे। लॉकडाउन के चलते जब सब कुछ बंद हो गया तो हम लोगों ने भी सभी अन्य स्कूलों की तरह ऑनलाइन पढ़ाना शुरू कर दिया था परंतु किसी भी तरह से अभिभावकों की तरफ से फ़ीस ना भरने के कारण स्कूल के प्रबंधक हम कर्मचारियों को पैसे देने में असमर्थ हो गए और उन्होंने हम सबको नौकरी से निकाल दिया। आज हमारे घर में खाने के लिए एक दाना भी नहीं है।”

http://pearlsofwords.com/1738-2/

अपनी सिसकियां दबाते और अपना सर झुका कर पल्लू से अपने आंसू पौंछते हुए वह स्वरों को संभालते हुए फिर बोली: मैडम, आप  मुझे किसी भी तरह का काम दे दीजिए, मैं सफाई का काम करने को भी तैयार हूं पर मेरे बच्चे का भूख से मुरझाया चेहरा मुझसे देखा नहीं जा रहा।

उस महिला की बात सुनकर मैं और रोमा एक दूसरे की ओर देखकर शून्य रह गए। हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम किस समाज  का हिस्सा है और हम इस महिला की किस तरह मदद करें की ना केवल इसकी आर्थिक स्थिति ठीक हो सके बल्कि एक शिक्षक की गरिमा भी बनी रहे।

बहुत सोचने के बाद फिलहाल तो रोमा ने उस महिला को अपने कर्मचारियों को शिक्षा (साक्षर) देने का काम देकर उसकी एक आए तय कर दी है, ताकि वह हमेशा शिक्षिका ही बनी रहे और उसे मजबूरी के कारण अपना आत्म सम्मान न खोना पड़े।

मेरा मन तो इसलिए बेहद बेचैन है कि उस महिला जैसे न जाने और कितने शिक्षक होंगे जिनको आज मदद की आवश्यकता है।

पल्लवी शेखर कि ओर पलट कर बोली: मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का हो रहा है कि इंसान अपनी ज़रूरतों के लिए पैसे तो किसी भी माध्यम से कमा ही लेगा ज्यादा ना सही कम कमा लेगा परंतु अपनी गरिमा को बनाए रखने के लिए अपने मनोबल को टूटने से बचाने के लिए वह क्या कर पाएगा!!

क्या हर बार उसे उसका सम्मान मांगना पड़ेगा?

क्या हम लोगों का एक दूसरे के कार्य से संबंधित सम्मान बनाए रखने का कोई दायित्व नहीं है?

कहते हुए पल्लवी चाई बनने चली गई। शेखर वहीं study table पर रखी अपने बच्चों की notebooks और आस पास रखे devices देखकर पल्लवी की बातों पर विचार कर रहे थे।

पल्लवी ने चाय और नाश्ते के साथ शेखर को बालकनी से आवाज़ लगाई।

दोनों बाहर पड़ती बारिश को देखने लगे…. 

तभी पल्लवी ने कहा:

वर्षों पहले जब कोई किसी को शिक्षित करता था तो वह साधारण दिखते हुए भी मास्टर जी कहलाते थे और लोग जीवन भर उनका केवल इस बात के लिए ही सम्मान करते थे कि उन्होंने हमें अक्षर बोध कराया है, पढ़ना लिखना सिखाया है। 

पर आज के शिक्षक अपनी हर संभव कोशिश से बच्चों तक पाठ के विभिन्न अंगों को विभिन्न उदाहरणों एवं विभिन्न संसाधनों के साथ पहुंचाने में लगे हैं मगर अफसोस की बात यह है कि आज शिक्षा केवल एक सेवा (service) बन रह गई है जिसकी हम कीमत देते हैं। यानी सम्मान की क्या बात है हम तो उनकी हर एक चीज को पैसे के तराजू में तोल कर बात करते हैं।

हम यह क्यों नहीं सोचते कि बेशक हम मां बाप अपने बच्चों को जितना मर्ज़ी अच्छा पढ़ा लें पर जो स्थान एक शिक्षक का अपने छात्र के जीवन में है वह कोई भी नहीं ले सकता यहां तक कि एक शिक्षक खुद भी अपने बच्चे को उस तरह नहीं पढ़ा सकता जिस तरह एक शिक्षक उस बच्चे को पढ़ा सकेगा इसलिए ही तो गुरु को ईश्वर का स्वरूप माना जाता है क्योंकि यदि ईश्वर ने हमें जीवन दिया है तो जीवन को अर्थ देने के लिए उन्होंने गुरु दिया है हमें गुरु को गुरु के सम्मान के साथ अपनाना चाहिए ना कि उनकी कीमत लगानी चाहिए। 

 यह मूल्यों की बात है, शिक्षा व्यापार नहीं है…

शेखर अब तक की हर बात को सुनने और समझने के बाद बोले: 

वैसे तो तुम ठीक कह रही हो पर यह एक तरफ़ा नहीं है। हर जगह केवल अभिभावक ही दोषी नहीं हैं, 

आज की शिक्षा प्रणाली में बड़े-बड़े स्कूलों की बड़ी-बड़ी कीमतों ने इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि यहां शिक्षा के नाम पर व्यापार हो रहा है।

लोगों ने शिक्षा जैसे महान कार्य को बाजार के चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है यही कारण है कि आज समाज में शिक्षा जैसे अनमोल रत्न की  बढ़ चढ़कर कीमत लगाई जाती है। 

ऐसे में इंसान करें भी तो क्या करें, मूल्यों को देखता है तो वस्तु स्थिति को नकार नहीं सकता वस्तु स्थिति को देखता है तो मूल्यों का निरादर होता है।

दोनों बातें एक दूसरे पर आधारित हैं, मगर एक अकेला व्यक्ति खड़ा होकर इन सब चीजों को सुधार नहीं सकता। 

इन सब का कोई न कोई कानून कोई न कोई तरीका तो होना ही चाहिए ताकि शिक्षा जैसी इतनी महत्वपूर्ण एवं पवित्र चीज का इस तरह निरादर ना हो सके।

Disclaimer: यह लेख एक काल्पनिक वार्तालाप है। इसका किसी व्यक्ति, संस्था, समुदाय एवं राजनैतिक दल से कोई संबंध नहीं है और ना ही इसके माध्यम से मैं किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना चाहती हूं। इसका उद्देश्य केवल हमारे आस पास में चल रहे वर्तमान समय के सबसे अहम विषय पर हो रही प्रतिक्रिया को मनोरंजक रूप से प्रस्तुत करना है।

Hello Readers, I’m a mommy blogger, I like to write on a wide range of topics. I'm an intense writer and a vigorous blogger. I write ideological scripts in the form of Poems, Short Stories etc with feel & purpose. Venture: SHE INSPIRES or प्रेरणा is a magazine where we women encourage each other and help to proceed further towards her dreams and happiness. That's all for now.. Hope you enjoy reading here in pearlsofwords.com Regards Author

5 Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *