उस बरसाती सुबह का तिरंगा 🇮🇳

“यह कहानी 16 अगस्त 2002 को घटी एक वास्तविक घटना पर आधारित है। इसमें व्यक्त भावनाएँ लेखिका के व्यक्तिगत अनुभव और संवेदनशीलता का प्रतिबिंब हैं।”

“कुछ घटनाएँ समय के साथ स्मृति नहीं बनतीं, वे हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं। यह उन्हीं में से एक है।”-

भाग 1 : उत्सव

अगस्त 2002, जयपुर की सुबहें उन दिनों कुछ अलग ही हुआ करती थीं। आसमान में हल्की-हल्की नमी, पेड़ों की पत्तियों पर ठहरी ओस, और हवा में कहीं दूर से सुनाई देता देशभक्ति गीतों का संगीत। मैं उस समय राजस्थान विश्वविद्यालय के महारानी कॉलेज में होम साइंस ऑनर्स की द्वितीय वर्ष की छात्रा थी और कॉलेज के पीछे स्थित एनी बेसेंट हॉस्टल में रहती थी।मेरे लिए 15 अगस्त केवल एक सरकारी अवकाश नहीं था। वह मेरे भीतर धड़कने वाला एक भाव था।

बचपन से ही तिरंगे के प्रति मेरे मन में एक ऐसी श्रद्धा थी, जिसका कारण शायद मैं स्वयं भी नहीं जानती थी। कहीं दूर किसी सरकारी भवन पर लहराता तिरंगा दिख जाए तो अनायास ही मेरी गर्दन तन जाती। राष्ट्रगान सुनते ही मन जैसे स्वयं सावधान की मुद्रा में खड़ा हो जाता। लगता था जैसे यह केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि अनगिनत बलिदानों की साँसों से बुना हुआ इतिहास है।उस सुबह भी मैं सबसे पहले उठने वालों में थी। स्नान कर तैयार हो चुकी थी। हॉस्टल की छत पर ध्वजारोहण होना था। वार्डन मैडम ने तिरंगा फहराया। “जन गण मन…” की धुन हवा में घुल गई। हम सबने एक स्वर में राष्ट्रगान गाया। उसके बाद मिठाइयाँ बाँटी गईं। चेहरों पर मुस्कान थी और आँखों में उत्सव।कार्यक्रम समाप्त होते ही वार्डन मैडम ने आवाज़ लगाई—”जल्दी तैयार होकर कॉलेज पहुँच जाओ। वहाँ भी मुख्य समारोह शुरू होने वाला है।” मैं तो मानो इसी आदेश की प्रतीक्षा कर रही थी।

कुछ ही देर बाद मैं महारानी कॉलेज के प्रांगण में थी। विशाल मैदान। चारों ओर छात्राएँ। मंच पर प्राचार्या महोदया। एनसीसी कैडेट्स पूरी वर्दी में अनुशासन की प्रतिमूर्ति बनी खड़ी थीं।तिरंगा धीरे-धीरे ऊपर उठा। रस्सी खिंची। फूलों की वर्षा हुई। “भारत माता की जय!” “वंदे मातरम्!” पूरा वातावरण जयघोष से गूँज उठा। मैं भी उसी भीड़ का हिस्सा थी, पर उस समय भीड़ में खोई नहीं थी। मेरी आँखें बार-बार तिरंगे पर जाकर ठहर जातीं। हवा के साथ उसका लहराना मुझे किसी जीवित अस्तित्व जैसा लगता था।

कार्यक्रम समाप्त हुआ। लड्डुओं का एक-एक पैकेट मिला। सहेलियाँ हँसती-बतियाती हॉस्टल लौट आईं। दिन भर स्वतंत्रता दिवस की छुट्टी का आनंद मनाया गया। शाम ढल गई। रात भी बीत गई। और समय अपनी सहज गति से अगले दिन में प्रवेश कर गया। मुझे क्या पता था कि अगले चौबीस घंटे मेरे भीतर कुछ ऐसा बदल देंगे, जिसे फिर कभी कोई बदल नहीं पाएगा।

भाग 2 : बरसात

16 अगस्त की सुबह। घड़ी में आठ बजने वाले थे। मेरा पहला व्याख्यान था।रात भर बारिश हुई थी। सुबह भी रिमझिम थमी नहीं थी। कॉलेज का बीच वाला बगीचा पानी से लबालब भरा हुआ था। वहाँ से होकर विभाग तक पहुँचना कठिन था। मैंने सोचा, आज सामने वाले मुख्य द्वार से होकर प्रथम तल की लंबी गलियारे से निकलती हूँ। वहाँ से दूसरी सीढ़ियों से उतरकर सीधे विभाग पहुँच जाऊँगी।किताबें बाँहों में दबाए मैं अपनी ही धुन में गलियारे से गुजर रही थी। बरसाती हवा चेहरे को छू रही थी। कहीं-कहीं छत से पानी की बूँदें टपक रही थीं।तभी…न जाने क्यों मेरी नज़र नीचे मैदान की ओर चली गई। मैं ठिठक गई। वहीं… ठीक उसी स्थान पर, जहाँ पिछली सुबह ध्वजारोहण हुआ था…

तिरंगा अब भी लहरा रहा था। एक क्षण के लिए मुझे लगा, शायद मैं भ्रम देख रही हूँ। मैंने रेलिंग पकड़कर फिर ध्यान से देखा। नहीं…वह सचमुच वहीं था। मेरे भीतर जैसे किसी ने अचानक घंटा बजा दिया। “यह कैसे हो सकता है?” दिल की धड़कन तेज़ हो गई। बारिश लगातार तिरंगे को भिगो रही थी। हवा उसे बार-बार झकझोर रही थी।मेरे मन में एक ही बात कौंध रही थी, “सूर्यास्त से पहले तो ध्वज उतार लिया जाता है… यह तो सबसे मूल नियम है… फिर यह अब तक ऊपर कैसे है?

“उस क्षण मेरे आसपास क्या हो रहा था, मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। कॉलेज वैसा ही चल रहा था। छात्राएँ आ-जा रही थीं। कक्षाएँ लग रही थीं। घंटी बज चुकी थी। लेकिन मेरे भीतर जैसे समय रुक गया था।मैं लगभग दौड़ते हुए अपनी कक्षा में पहुँची।

भाग 3 : अकेली आवाज़

“अरे… तुम लोगों ने देखा?” मैंने साँस सँभाले बिना ही पूरी कक्षा से पूछा। सबने मेरी ओर देखा। “क्या हुआ?”

“झंडा… अभी तक ऊपर है!” कुछ लड़कियाँ खिड़की तक गईं। किसी ने एक नज़र डाली और फिर अपनी सीट पर लौट आई। “तो?”

उसका सहज-सा उत्तर मेरे भीतर हथौड़े की तरह लगा। “तो मतलब? कल शाम उसे उतारना चाहिए था। यह नियम है। “कक्षा में कुछ पल का मौन रहा। फिर किसी ने मुस्कराकर कहा, “अरे यार… इतनी-सी बात पर परेशान हो रही हो?

“मैं एक-एक छात्रा के पास गई।” तुम लोग समझ क्यों नहीं रही हो? तिरंगे के सम्मान के नियम होते हैं। उसे सूर्यास्त से पहले उतारा जाता है। ज़मीन पर नहीं गिरने दिया जाता। कितने सम्मान से उसे संभाला जाता है। अटारी बॉर्डर की रिट्रीट सेरेमनी देखी है? कितनी सावधानी से सैनिक उसे अपनी बाँहों में लेकर जाते हैं।

“मेरे शब्दों में बेचैनी थी। उनकी आँखों में उदासीनता। तभी मेरी सबसे प्रिय सहेली दिव्या धीरे से मेरे पास आई।उसने मेरा हाथ पकड़ा और कक्षा से बाहर ले गई।

“रमन… क्या हो गया है तुझे? तू इतनी परेशान क्यों है?” मैंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “दिव्या… बात झंडे की नहीं है। बात उस सम्मान की है जो हम उसे देना भूल रहे हैं। अगर हम अपने राष्ट्रीय ध्वज का भी ध्यान नहीं रख सकते, तो फिर देशभक्ति केवल भाषणों में ही रह जाएगी।”

दिव्या चुप रही। शायद वह मुझे समझने की कोशिश कर रही थी, लेकिन मेरी बेचैनी की गहराई तक पहुँच नहीं पा रही थी। अब मेरे लिए कक्षा में बैठना असंभव था। मैं सीधे प्राचार्या कार्यालय की ओर बढ़ गई। प्राचार्या से मिलना आसान नहीं था। बाहर ही रोक दिया गया।तब मुझे याद आया कि हॉस्टल वार्डन का कमरा पीछे वाले हिस्से में है। वहाँ मेरी पहचान थी।मैं तेज़ी से वहाँ पहुँची।

“मैडम…”उन्होंने मेरी ओर देखा।”क्या बात है?” “मैडम… मैदान में कल वाला तिरंगा अभी तक ऊपर है।”

मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि उनके चेहरे का रंग बदल गया।उन्होंने तुरंत खिड़की से बाहर देखा। फिर बिना एक क्षण गँवाए चौकीदार को आवाज़ दी, “अभी… इसी वक्त जाकर झंडा नीचे उतारो।”

उनकी आवाज़ में घबराहट थी। मुझे पहली बार लगा कि शायद मेरी बात सचमुच गंभीर थी। मैं भी वहीं गलियारे में खड़ी रह गई। बारिश अब भी लगातार हो रही थी। चौकीदार भीगता हुआ ध्वजदंड तक पहुँचा। उसने रस्सी खोली। तिरंगा नीचे आने लगा। मेरे चेहरे पर पहली बार हल्की-सी राहत आई। “चलो… देर से ही सही, अब इसे सम्मान से उतारा जाएगा…”लेकिन अगले ही क्षण…उसने रस्सी को एक झटके से खींच दिया।तिरंगा नियंत्रण खो बैठा। भीगे कपड़े का भार बढ़ चुका था। एक तेज़ आवाज़ के साथ वह नीचे गिरा…और सीधे चौकीदार के जूतों पर आकर ठहर गया।मेरे भीतर कुछ टूट गया।मैं बिना कुछ सोचे दौड़ पड़ी। बारिश, सीढ़ियाँ, भीगा प्रांगण…कुछ भी याद नहीं। बस इतना याद है कि मैंने झुककर दोनों हाथों से तिरंगे को उठाना चाहा। तभी चौकीदार ने जल्दी से उसे मेरे हाथों से खींच लिया। “अरे बिटिया, क्या कर रही हो?” मैंने भीगे चेहरे के साथ उसकी ओर देखा। “मैं इसे ले नहीं जा रही… बस ज़मीन पर मत रहने दीजिए।” उसने मेरी बात सुनी भी या नहीं, मैं नहीं जानती।वह तिरंगा समेटकर आगे बढ़ गया और मैं…वहीं बारिश में खड़ी रह गई। भीगी हुई। निःशब्द। लेकिन भीतर एक तूफ़ान अब भी थमा नहीं था….

भाग 4 : भीड़

मैं भीग चुकी थी। कक्षा में लौटने का मन नहीं हुआ। किताबें उठाईं और सीधे हॉस्टल चली आई। कमरे का दरवाज़ा बंद किया तो भीतर जमा हुआ सारा आवेग आँखों के रास्ते बह निकला।

उस दिन मैं बहुत रोई। न जाने कितनी देर तक। मैं भगवान से बातें करती रही।

“वाहेगुरु… इस देश के लिए कितने लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। किसी ने अपने बेटे खोए, किसी ने अपना घर, किसी ने अपना जीवन। यह वही तिरंगा है जिसके सम्मान के लिए लोग हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर झूल गए। फिर हमसे उसका एक दिन का सम्मान भी क्यों नहीं सँभलता?”

उस समय मेरे भीतर किसी व्यवस्था के प्रति क्रोध नहीं था। केवल एक गहरी पीड़ा थी।

उसी दिन संयोग से पिताजी जयपुर आए हुए थे। राजस्थान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के सभागार में भारत विकास परिषद का स्वतंत्रता दिवस सम्मेलन आयोजित था। मुझे समय पता था, इसलिए मैं भी वहाँ पहुँच गई।

रास्ते भर सोचती रही—शायद यहाँ मेरी बात सुनी जाएगी। यहाँ ऐसे लोग होंगे जो राष्ट्र के सम्मान का अर्थ समझते होंगे।

सम्मेलन के बीच चाय का अवकाश हुआ। मैंने साहस जुटाया और एक वरिष्ठ अतिथि के पास जाकर पूरी घटना विस्तार से कह सुनाई।

उन्होंने ध्यान से सुना।

चेहरे पर गंभीरता भी आई।

पर अगले ही क्षण उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

“बेटा… अब बात बढ़ाने से क्या लाभ? गलती हो गई होगी। रहने दो।”

इतना कहकर वे दूसरी ओर बढ़ गए।

मैं कुछ क्षण वहीं खड़ी रह गई।

उस दिन पहली बार मुझे समझ आया कि किसी बात का सही होना और किसी का उसके साथ खड़ा होना—दो अलग-अलग बातें हैं।

पिताजी ने भी धीरे से मेरा हाथ दबाया।

“छोड़ो बेटा… कभी-कभी बात यहीं समाप्त कर देना बेहतर होता है।”

मैंने उनकी ओर देखा। वे मुझे शांत करना चाहते थे। लेकिन मेरे भीतर जो बेचैनी थी, उसका कोई शब्द नहीं था।

शाम तक जब मैं हॉस्टल लौटी, तब तक घटना ने एक नया रूप ले लिया था।

छात्र राजनीति के कुछ सदस्य मेरे पास आने लगे।

“क्या हुआ?”

“हमें भी बताइए।”

“यह कॉलेज प्रशासन की लापरवाही है।”

मैं उस समय राजनीति की बारीकियाँ नहीं समझती थी। मुझे लगा, शायद अब लोग उस मूल बात पर बात करेंगे जिसके लिए मैं सुबह से व्याकुल थी।

पर बहुत जल्दी समझ में आ गया कि हर व्यक्ति अपने-अपने उद्देश्य लेकर आया है।

किसी को प्रशासन को घेरना था।

किसी को समाचार बनाना था।

किसी को अपनी छात्र इकाई का प्रभाव दिखाना था।

किसी को विरोध का अवसर चाहिए था।

धीरे-धीरे शोर बढ़ने लगा।

नारे लगे।

प्राचार्या कार्यालय के सामने भीड़ जमा हो गई।

किसी ने कहा, दैनिक समाचार पत्र के लोग भी पहुँच गए हैं।

मैं उस भीड़ के बीच खड़ी थी…

पर पहली बार मुझे लगा कि जिस बात के लिए मैंने आवाज़ उठाई थी, वह अब सबसे पीछे छूट चुकी है।

अब वहाँ तिरंगा नहीं था।

केवल तिरंगे के नाम पर चल रही अपनी-अपनी राजनीति थी।

कुछ देर बाद वार्डन मैडम ने मुझे बुलाया।

उनके चेहरे पर नाराज़गी थी।

“जब बात ठीक हो गई थी, तब उसे इतना बढ़ाने की क्या ज़रूरत थी?”

मैंने कुछ कहना चाहा…

फिर चुप रह गई।

कैसे समझाती कि मैंने शोर नहीं मचाया था…

मैं तो केवल एक प्रश्न पूछ रही थी।

शोर तो बाद में आया था।

और उस शोर ने सबसे पहले उसी प्रश्न को निगल लिया था।

भाग 5 : मौन

उस घटना के बाद जीवन अपनी सामान्य गति से चलता रहा।

कक्षाएँ लगीं।

परीक्षाएँ हुईं।

वर्ष बदल गए।

कॉलेज छूट गया।

लोग बिछड़ गए।

लेकिन वह बरसाती सुबह मेरे भीतर कहीं स्थिर रह गई।

समय बीतने के साथ मैं समझदार हुई।

समाज को थोड़ा और जाना।

व्यवस्था को भी।

राजनीति को भी।

और मनुष्यों को भी।

तब जाकर मुझे समझ आया कि उस दिन मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि तिरंगा समय पर नहीं उतारा गया।

दुख इस बात का भी नहीं था कि वह क्षण भर के लिए ज़मीन पर गिर गया।

मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह थी कि इतने लोगों के बीच किसी की संवेदना नहीं गिरी…

क्योंकि वह पहले ही कहीं खो चुकी थी।

उस दिन मैंने जाना कि नारे लगाना आसान है।

देशभक्ति पर भाषण देना आसान है।

तिरंगे के साथ तस्वीरें खिंचवाना भी आसान है।

कठिन है…

जब कोई देख न रहा हो,

तब भी उसका सम्मान करना।

उस बरसाती सुबह तिरंगा केवल कुछ क्षणों के लिए भीगा था…

लेकिन मेरी मासूमियत हमेशा के लिए भीग गई थी।

मैं उस दिन अपने देश से निराश नहीं हुई थी।

मैं पहली बार मनुष्यों की संवेदनहीनता से परिचित हुई थी।

शायद जीवन में हर संवेदनशील व्यक्ति के हिस्से ऐसी कोई-न-कोई बरसाती सुबह आती है।

जब वह किसी प्रतीक को बचाने दौड़ता है, और लौटते समय समझता है कि असली संकट उस प्रतीक पर नहीं, मनुष्य के भीतर है।

प्रतीक बदलते रहते हैं।

कभी वह तिरंगा होता है, कभी कोई पुस्तक, कभी कोई रिश्ता, कभी कोई बूढ़ा हाथ, कभी किसी बच्चे की आँखों का विश्वास।

लेकिन प्रश्न हर बार वही रहता है—

क्या हम अब भी उतने संवेदनशील हैं कि जब कोई नहीं देख रहा हो, तब भी सही बात के पक्ष में खड़े हो सकें?

क्योंकि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं बनते।

राष्ट्र उन लोगों से बनते हैं जिनके भीतर सम्मान अभी जीवित है।

और जिस दिन किसी समाज की संवेदनाएँ उसके प्रतीकों से बड़ी हो जाती हैं, उसी दिन उसके प्रतीकों का सम्मान अपने-आप सुरक्षित हो जाता है।

शायद उस दिन मैं तिरंगे को बचाने नहीं दौड़ी थी।

शायद…

मैं अपने भीतर बची हुई मनुष्यता को गिरने से रोकने दौड़ी थी।

“यदि इस कहानी ने आपको कुछ क्षणों के लिए भी मौन कर दिया, तो इसका उद्देश्य पूरा हुआ।”

Ramandeep Kaur

Founder of Pearls of Words | Writer | Psychology • Spirituality • Life

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