सीमाओं की तलाश भाग–2 : विश्वास का जन्म
भूमिका:
इस संस्मरण के सभी पात्र वास्तविक घटनाओं से प्रेरित हैं। आवश्यकता पड़ने पर नाम और कुछ परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं ताकि कहानी का केंद्र किसी व्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभव और उससे मिली सीख पर रहे।

सीमाओं की तलाश भाग–2 : विश्वास का जन्म
कभी-कभी जीवन किसी दरवाज़े को बंद करता है, केवल इसलिए कि वह हमें किसी दूसरे दरवाज़े तक पहुँचा सके। कोविड का समय भी मेरे लिए कुछ ऐसा ही था। स्कूल बंद हो चुके थे। बच्चों की चहल-पहल अब मोबाइल की स्क्रीन में सिमट गई थी। घर ही स्कूल बन गया था, और व्हाट्सऐप ग्रुप बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच एकमात्र पुल। मेरी छोटी बेटी भी अब औपचारिक शिक्षा की उम्र में पहुँच चुकी थी। उसका नए स्कूल में प्रवेश हो चुका था और ऑनलाइन कक्षाएँ शुरू हो गई थीं। हर दिन पढ़ाई के बाद गतिविधियों, होमवर्क और सूचनाओं की भरमार व्हाट्सऐप पर आने लगी।
एक दिन बच्चों की गतिविधियों के वीडियो देख रही थी कि अचानक एक चेहरा मेरी स्मृतियों से निकलकर सामने आ गया।
“अरे… यह तो वही बच्चा है…” वह भावेश था। वही मासूम मुस्कान…वही मंच पर सहज आत्मविश्वास…और वही रचनात्मक ऊर्जा, जिसने कुछ वर्ष पहले मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा था। इस बार मैंने केवल बच्चे को नहीं देखा, बल्कि उसके पीछे खड़े उस परिवार को जानने की इच्छा हुई जिसने इतनी छोटी उम्र में उसके भीतर यह आत्मविश्वास जगाया था। मैंने उसके अभिभावकों से संपर्क करने की कोशिश की। मन में केवल एक प्रश्न था—”क्या मेरी बेटी भी ऐसी गतिविधियाँ सीख सकती है?” कुछ प्रयासों के बाद मुझे उसकी माँ का नंबर मिल गया। यहीं से पहली बार मेरी बात आस्था से हुई।
हम दोनों एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अनजान थीं। न हमने एक-दूसरे को देखा था। न यह जानते थे कि कौन कहाँ रहता है। लेकिन बातचीत के पहले ही दिन एक अजीब-सी सहजता महसूस हुई। बात केवल बच्चों की पढ़ाई तक सीमित नहीं रही। धीरे-धीरे वह किताबों, रचनात्मकता, गतिविधियों, सीखने के तरीकों और जीवन के अनुभवों तक पहुँच गई। उस समय आस्था हिमाचल प्रदेश के एक ऑनलाइन समाचार मंच के लिए कार्य कर रही थी। दूसरी ओर मैं अपने लेखन, कविताओं और विचारों की दुनिया में डूबी हुई थी। हम दोनों के काम अलग थे…पर ऊर्जा एक जैसी थी। हम दोनों कुछ नया करना चाहती थीं।हम दोनों बच्चों के सीखने को केवल किताबों तक सीमित नहीं मानती थीं।और शायद यही समानता हमारी मित्रता की पहली नींव बनी।धीरे-धीरे हमने एक-दूसरे के नंबर सुरक्षित किए। स्कूल की सूचनाएँ साझा होने लगीं। बच्चों की गतिविधियाँ साझा होने लगीं। फिर विचार साझा होने लगे और देखते ही देखते संवाद, औपचारिकता की सीमा पार कर आत्मीयता में बदलने लगा।
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि विश्वास अचानक नहीं बनता। वह छोटी-छोटी बातों से बनता है। समय पर किए गए एक संदेश से… किसी की बात ध्यान से सुन लेने से… एक-दूसरे के काम की सच्ची प्रशंसा से… और इस एहसास से कि सामने वाला आपकी बात को महत्व देता है। मुझे तब बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यही विश्वास आने वाले वर्षों में मेरे जीवन की सबसे बड़ी शक्ति भी बनेगा… और सबसे कठिन परीक्षा भी। विश्वास हमेशा धोखे से नहीं टूटता। कई बार वह अपेक्षाओं के बोझ तले धीरे-धीरे थक जाता है। लेकिन उस समय… हम दोनों को इस बात का कोई आभास नहीं था। हम केवल दो माताएँ थीं… जो अपनी-अपनी बेटियों के लिए कुछ बेहतर खोज रही थीं और शायद वहीं से हमारी साझा यात्रा सचमुच शुरू हुई।
Reflection —
विश्वास धीरे-धीरे जन्म लेता है, विश्वास शायद जीवन की उन चीज़ों में से है जिन्हें हम बनते हुए देख नहीं पाते। कोई एक दिन नहीं आता जब हम तय करते हैं कि, “आज से मैं तुम पर विश्वास करती हूँ।” विश्वास छोटे-छोटे अनुभवों के बीच चुपचाप जन्म लेता है। किसी का समय पर जवाब देना… बिना कहे आपकी बात समझ लेना… आपके बच्चे के लिए कुछ अच्छा करना… आपके काम की सच्चे मन से तारीफ़ करना… या फिर बस इतना कि किसी से बात करके आपको लगे, “यह व्यक्ति मुझे समझता है।” शायद उस समय मेरे साथ भी यही हुआ था। मैंने सामने वाले व्यक्ति में कोई भविष्य नहीं देखा था। मैंने कोई पाँच साल की यात्रा नहीं सोची थी। न किसी रिश्ते का नाम तय किया था, न कोई अपेक्षा बनाई थी। बस दो स्त्रियाँ थीं।दो बच्चे थे।कुछ साझा रुचियाँ थीं, जो और बातचीत में मिलने वाली एक सहज-सी आत्मीयता थी। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो एक बात बहुत स्पष्ट दिखाई देती है—विश्वास जितना खूबसूरत होता है, उतना ही जिम्मेदारी माँगता है। क्योंकि जहाँ विश्वास बढ़ता है, वहाँ हमारी सीमाएँ अक्सर अपने-आप ढीली होने लगती हैं। हम सामने वाले को थोड़ा और भीतर आने देते हैं। फिर थोड़ा और। फिर अपनी दिनचर्या का हिस्सा। फिर अपनी परेशानियाँ। फिर अपनी निजी बातें, और कभी-कभी हमें पता ही नहीं चलता कि कब किसी व्यक्ति के लिए हमारे जीवन में वह स्थान बन गया, जिसे हमने कभी औपचारिक रूप से दिया ही नहीं था। शायद मेरी कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है—विश्वास करना गलत नहीं था। गलती शायद वहाँ हुई जहाँ मैंने यह मान लिया कि विश्वास अपने आप में पर्याप्त है।
अब मैं समझती हूँ—विश्वास के साथ विवेक भी चाहिए। आत्मीयता के साथ सीमा भी चाहिए। सहयोग के साथ संतुलन भी चाहिए। और किसी को अपने जीवन में स्थान देने के साथ यह समझ भी कि वह स्थान कितना है। क्योंकि हर अच्छा आरंभ हमेशा अच्छे अंत की गारंटी नहीं होता और इसका अर्थ यह भी नहीं कि वह आरंभ झूठा था। कुछ रिश्ते सच में अच्छे होते हैं। कुछ समय तक बहुत अच्छे होते हैं। वे हमें कुछ देते हैं, हम उन्हें कुछ देते हैं। फिर परिस्थितियाँ बदलती हैं। लोग बदलते हैं, अपेक्षाएँ बदलती हैं और एक दिन हमें अपने पुराने विश्वास को नए अनुभवों की रोशनी में फिर से देखना पड़ता है। इसलिए आज मैं अपने उस पुराने विश्वास को दोष नहीं देती। वह उस समय की मेरी सच्चाई थी। मैंने जिस विश्वास से रिश्ता शुरू किया था, वह भी सच्चा था और जो सीख मुझे बाद में मिली—वह भी सच्ची है।
शायद परिपक्वता का अर्थ यही है कि हम अपने पुराने निर्णयों को केवल सही या गलत की कसौटी पर न तौलें। बल्कि उनसे पूछें—“तुमने मुझे क्या सिखाया?” और मेरे उस विश्वास ने मुझे एक बहुत बड़ी बात सिखाई—विश्वास दरवाज़ा खोल सकता है, लेकिन सीमा तय करना हमें ही सीखना पड़ता है।
— रमनदीप कौर Pearls of Words ✍🏻🌸