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An Interesting Article On Woman from Vedic Period to Technical Era By Dr. Meera Mishra

मीरा मिश्रा,

सेवा निवृत्त प्रोफेसर,

बराबू, मुजफ्फरपुर.

‘वैदिक ऋषिका से आधुनिका तक’-पथ महान या पथिक ?

महिला, अर्थात महान, के कृतित्व की पूर्वकथा स्मरणीय है-पूर्व-वैदिक, वैदिक काल में उनका पारिवारिक, वैचारिक, धार्मिक व्यक्तित्व स्वातन्त्र्य, सफल पत्नीत्व, मातृत्व, सम्यक् चिन्तन, शिक्षा, आत्म-विकास के मार्ग पर, अग्रणी रहा।

उत्तर-वैदिक काल में, “अपराध-अंधकार-पुंज” व “पुरुष-मुखापेक्षी” रूप, कालिदास की शकुंतला का भरत की माँ के रूप में अधिकार-संघर्ष, ब्रह्म वादिनी द्रौपदी का युधिष्ठिर द्वारा जुए में हार कर ‘अन्य’ को दिए जाने का पुरजोर विरोध, स्मृतिकारों-सूत्रकारों की ‘आचार-संहिता’ में घनघोर तमस् का जीवन- महिला के अतीत के बिंब हैं।

अनन्तर, सती, जौहर, देवदासी-प्रथा का दंश झेलती महिला, स्वतंत्रता-पूर्व और स्वातंत्र्योत्तर काल में राम मोहन राय, ज्योतिबा फुले, पंडिता रमाबाई, कित्तूर चेन्नम्मा, डॉ एनी बेसेंट अरुणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू के प्रयत्नों से शैक्षणिक,वैचारिक, आत्मिक स्वतंत्रता प्राप्त कर, निज चिन्तन -स्तर को समृद्ध करती हैं।

इस काल-विंदु पर महिला के गुणानुवाद, महिमामंडन और आदर्शीकरण से संबद्ध विचार को हम विराम दें। इतिहास-पृष्ठ पर, महिला का जयघोष, मूर्तिकरण असंगत, असामयिक होगा, जब तक उनकी चिर-संगी पर्यावरण, और अन्य संबद्ध वर्गों का उन्नयन व आत्मोद्धार न हो।
जब तक, शतकों से बोझ बने जाति-धर्म-भाषा -संप्रदाय-पंथ के बंधनों से “जन-मस्तिष्क” के विचार -तंतुओं की मुक्ति न हो, शुद्ध और ‘सर्व-हित-चिन्तन-वृत्ति’ न विकसित हो…,”प्रेम- सेवा- करुणा” से महिला व्यक्तित्व का मंडन मात्र एक विडम्बना है।

महिला वैचारिक स्वतंत्रताओं से निःसृत गुणवत्ताओं को अर्जित करें, उन्हें निज गुण से सज्जित करें, ‘युग-समाज -चिन्तन’ में क्रांति का निर्देशन महिला न करे तो,समाज की प्रगति अवनति में बदल सकती है…..
विचारकों का कथन है, “बड़ा सामाजिक परिवर्तन महिलाओं के सहयोग बिना असंभव है…” “महिला-सहयोग से राजस्थान का खेजड़ली आंदोलन पर्यावरण-चेतना में शीर्षस्थ है…” पर्यावरण -नारीवाद -‘इको फेमिनिज्म’संस्कृति, धर्म, साहित्य में महिला और प्रकृति के संबंधों में शोध कर रहा है.पर्यावरण-नारीवाद को गढ़ने वाले ‘ओ ला मार्ट’-फ्रेंच नारीवादी चिन्तक कहता है, “महिला,प्रकृति और दलित” को उपभोग की दृष्टि से देखना इतिहास व वर्तमान का दुःखद पक्ष है……

एमहर्स्ट में आयोजित सम्मलेन (१९८०) (विषय:महिला और पृथ्वी पर जीवन) में “पर्यावरण-नारीवाद” विश्व-समाज-क्रान्ति के लिए शुभ संकेत है। …
दलित -शोषण संघर्ष में महिला-कृतित्व,सहयोग अपेक्षित है…..
‘शुभस्य शीघ्रम’ ……

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