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शीर्षक -राष्ट्रीय शिक्षा और सामाजिक समरसता उन्नयन में ऑनलाइन शिक्षा की भूमिका

सर्वद्रव्येषु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् ।अहार्यत्वादनर्ध्यत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥

अर्थ: सब धनों में विद्यारुपी धन सर्वोत्तम है, क्योंकि इसे न तो छीना जा सकता है और न यह चोरी की जा सकती है. इसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती है और उसका न इसका कभी नाश होता है.

Pro. Dr. Mira Bharati Mishra ji Pune, Maharashtra

जन-मानस मनोवृत्ति और कर्मयोग, संग समाज -वृत्ति व समाज-समूहों की कार्य-शैली का निर्धारण शिक्षा द्वारा होता है। भारतीय शिक्षा प्रणाली अनेक त्रुटियों से संघर्ष करती रही है,जैसे,छात्रों के सुविचार-तंत्र के निर्माण ,चरित्र-उन्नयन में असफल शिक्षा-तंत्र अनुपयुक्त पाठ्यक्रम,अपर्याप्त शिक्षण-उपकरण,संसाधन, कर्मियों में स्वाभिमान,प्रेरणा का निम्न स्तर,दंड और परीक्षाओं का भय आदि।

विशेषज्ञों की राय में,उन्मुक्त वर्गव्यवस्था काल में भी ऑनलाइन शिक्षा,ई-लर्निंग से छात्रों में मैत्री-बोध आवश्यक है, जो उनकी डिजिटल साक्षरता उनके लिए संभावनाओं के नवद्वार खोलती है । दूसरी ओर आलोचकों का मत है कि ऑनलाइन शिक्षण ज्ञान पारम्परिक वर्ग व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता, जिसके तीन विन्दु हैं।

  1. छात्र के स्थानीय परिवेश,शिक्षा सम्बंधित जरूरतों का संज्ञान लेकर स्थानीय शिक्षक वर्ग में पढ़ाते हैं।
  2. शिक्षक के संस्पर्श, दृष्टि-प्रोत्साहन से छात्र विषयवार जीवंत अध्ययन में रूचि लेते हैं।
  3. प्राथमिक,मध्य,उच्च विद्यालय के छात्र,अभिवावक और उच्च शिक्षा के ग्रामीण,व छोटे शहरी क्षेत्रों के छात्रों में डिजिटल लर्निंग के प्रति स्वीकार्यता नहीं है।

ई-शिक्षा के विविध रूपों में वेब आधारित लर्निंग,वर्चुअल क्लास हैं,दो श्रेणियों सिंक्रोनस और असिंक्रोनस में विभक्त हैं। वेब आधारित अध्ययन,ऑनलाइन कोर्स,ऑडियो-विडिओ कॉन्फ़्रेंसिंग,ब्लोग वेबसाइट,वीडियो ट्यूटोरियल्स, ई-बुक्स आदि छात्र-लोकप्रिय हैं। उच्च शिक्षा के छात्रों का एक बड़ा वर्ग असिंक्रोनस के माध्यम से अध्ययन करता है।

ऑनलाइन शिक्षण पद्धति के दोष/सीमाएं भारतीय संदर्भ में हैं-

  1. केवल १९ प्रतिशत भारतीयों की पहुँच स्मर्टफ़ोन, इंटरनेट तक है,अधिकतर परिवारों में १ ही डिवाइस है जिसका उपयोग परिवार की आजीविका के निमित्त होता है।
  2. निःशुल्क विषय सामग्री अंतःक्रियात्मक नहीं है,अच्छी गुणवत्ता की विषय सामग्री ऊँची कीमत पर हैं, छात्र जिसमे व्यय नहीं कर सकते। इससे नए तरह की विषमता पैदा होती है।
  3. वीडियोज़ पर अधिक निर्भरता बच्चों को निष्क्रिय बना देती है।
  4. ऑनलाइन माध्यम सामाजिक विज्ञानों,साहित्य, कला में संकल्पनात्मक ज्ञान,विवेचनात्मक, विश्लेषणात्मक सूझ के विकास में उपयोगी नहीं है। विज्ञान,गणित,इंजीनियरिंग विषय में उपयोगी हैं। व्यक्तिपरक विषय और प्रश्नोत्तरों के शिक्षण में अनुपयोगी है। शिक्षक-छात्र परिचर्चा,वाद-विवाद के अवसर नहीं हैं।
  5. ऑनलाइन कोर्स में स्थानीय पहुँच नहीं हैं। स्थानीय पौधे,जानवर,इतिहास,संस्कृति का ज्ञान नहीं हो पाता।
  6. शिक्षकों को सीखने की प्रेरणा,नहीं है, इंटरनेट प्लान,डिवाइस, लर्निंग का समय,स्थान प्राप्त नहीं है।
  7. शिक्षक स्वयं को स्थानापन्न,अनावश्यक पाते हैं,परन्तु उन्हें ऑनलाइन विषयवस्तु को विमर्श, प्रश्नमाला,छात्र विचार उन्नयनके माध्यम से संपूरक बनाकर भ्रांतियों को दूर करना चाहिए।
  8. छात्रों/शिक्षकों के लर्निंग परिणाम और अन्तःक्रियाओं के डेटा के स्वामित्व से सॉफ्टवेयर कंपनियां धन उत्पादन करती हैं, क्योंकि गोपनीयता सुरक्षित नहीं होती। छात्र प्रतियोगिता के बाजार में खुले होते हैं।

नवीन शिक्षा नीति में ऑनलाइन शिक्षा को महत्तर बनाने का समर्थन है,परन्तु उसकी चुनौतियों /कठिनाइयों के समाधान की दिशा में प्रयत्न नहीं है।शिक्षा अभियान का अखंड दीप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ‘कवि के साथ कॉफ़ी’ फेसबुक पटल पर ‘डॉ सत्याहोपमीट ‘ सदस्यों द्वारा विगत दो वर्षों से डॉ सत्यप्रकाश पांडेय के एकनिष्ठ संचालन में महामना मदन मोहन मालवीय की कृपापूर्ण प्रेरणा से जल रहा है। वर्तमान में,१ दिसंबर से महामना जन्मजयंती के अवसर पर ‘ऑनलाइन शिक्षा और इसके माध्यम से देश और समाज में सामाजिक समरसता का प्रयास ‘ विषय पर कार्यशाला चलाई जा रही है।

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