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Wonderful Hindi Article on Existence of Women after 75 years of Indian Independence & by Maya Saini

आजादी, महज एक शब्द बनकर रह गया है, आज विदेशी लोगो की आजादी का 75 वा साल है, हम 75 सालों में कितने बदले है?

आइये हम आपको हमारे समाज और देश का एक आईना दिखाते हैं__

जयपुर, राजस्थान की

-माया सैनी

शिक्षिका होने के साथ साथ दर्शनिक रचनाकार…

Maya Saini

हमें महज अंग्रेजो से आजादी मिली है, लेकिन अपने ही लोगो के और उनकी मानसिकता के बीच आज भी हम कैद बने बैठे है। भारत में 75 फीसदी से अधिक जगहों पर तो लोग आपस में लड़का लड़की का बात करना भी पसंद नही करते ।

कितनी आजादी मिली है, हमें ?

आज भी महिलाएं आजाद भारत में किसी ना किसी रूप में कही ना कही बन्दी की तरह जीवन यापन कर रही हैं आज भारत को स्वतंत्र हुए 75 साल हो गये। कितनी ही तरक्की कर ली हो चाहे किसी भी विभाग में, शिक्षा के नये आयाम खोले हो, सरकार ने कितनी ही योजनाएं बनाई हो कितने ही नये कानून लागू किये हो लेकिन फिर भी महिलाएं किसी ना किसी रूप में पुरुषवादी समाज से प्रताड़ित की जाती हैं। ये महिलाओं में लाचारगी है या इस दोमुँहे समाज की बेचारगी जो महिलाओं का अस्तित्व देह से आगे स्वीकारने को तैयार ही नही होता है।

इसमें राष्ट्रीय महिला उत्थान नीति की बात करना जरूरी है. जिसमें महिलाओं के उत्थान, भागीदारी और समानता के लिए काम किया गया. याद कीजिए, हाल में ही प्रधानमंत्री का भाषण जिसमें उन्होंने कहा था कि महिलाओं को हक़ देने वाले हम कौन हैं. महिलाओं को अपने फैसले खुद लेने हैं इस बीच किसी को बाधा नही बनना चाहिए। लेकिन ये सब एक भाषण तक ही सीमित है असल जिंदगी में कोई भी पुरुष महिला को ऐसा नही करने देता हमारे देश में 80% पुरुष आज भी नारी को अपने पैर की जूती ही समझता है फिर चाहे वह महिला कितना ही पढ़ी लिखी हो हर तरह का ज्ञान रखती हो। लेकिन उसे अपने फैसले लेने का कोई हक़ नही दिया जाता हैं।
20% लोग या पुरुष ऐसे होते है जो महिलाओं को अपनी बराबर कदम से कदम साथ रखते है काश हमारे देश में सभी पुरुषों की सोच ऐसी होती।

नारी के लिए सुरक्षा और सुविधा जुटाते रहने के कारण ही पुरुषवादी समाज को मान्यता मिलती गई। इसलिए इस ढांचे को भी तोड़ना होगा। परिवार जरूरी है लेकिन कर्तव्य और अधिकार समान होना भी जरूरी है. बेशक शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता महिलाओं के दशा और दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव ला रहा है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाए महिलाओं को समानता का हक दिलाने में और अधिक सफलता दे रही है। लेकिन स्किल इंडिया जैसे स्वरोजगार के विकल्प महिलाओं के लिए पंख बनकर उभरेंगे।

इससे बहुत बड़ी चीज तकनीक है जो महिलाओं की जिंदगी बदल रही है. गाव की लड़कियां बड़े-बड़े कॉलेज स्कूल से घर बैठे अपनी पढ़ाई कर रही हैं। बड़ी ऑनलाइन कंपनियों से जुड़ कर उत्पाद बेच रही हैं। अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही हैं। इसलिए इस परिप्रेक्ष्य में तकनीक का बहुत बड़ा हाथ है।

आज भी हम रात 9 बजे के बाद लड़कियों को बाहर नही निकलने देते, क्योंकि असुरक्षा की भावना इतनी है कि निर्भया जैसी दुर्घटना होने की आशंका से हर बाप डरा हुआ है। ये घटनायें जितना बड़ा दुःस्वप्न है, उससे भी बड़ी इन घटनाओं के बाद होने वाली राजनीति है।

समाज में अगर सुरक्षा सरकार सुनिश्चित कर दे तो शायद अलग से कुछ प्रयास करने की जरूरत नही।सरकार सुरक्षा दे और परिवार लिंग-भेद को दूर करें। सिर्फ इतनी कोशिशों की दरकार है। आज़ादी के 75 वर्षों में हमने ज़मीन से अंतरिक्ष तक बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की हैं।इस उम्मीद के साथ की बहुत जल्द ही नारी की दशा बदलेगी। ये केवल विमर्श का केंद्र-बिंदु नही बन कर रह जायें। बलात्कार ,भ्रूण हत्या, इज़्ज़त के लिए बेटियों की हत्या केवल अतीत का हिस्सा ही बनकर रह जायेगा।

आज भी बड़ा सवाल यही है कि हमारी आधी-आबादी में यानी महिलाएं कितनी स्वतंत्र हुई है. ख़ासकर उस समय जब प्रधानमंत्री को भी ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ कर भ्रूण हत्या के खिलाफ बोलना पड़ रहा है।

आजादी के सातवें दशक में हम कदम रखने जा रहे हैं लेकिन हर बार हमारे सामने ये सवाल खड़ा हो जाता है कि स्वतंत्र देश में हमारी महिलाएं कितनी स्वतंत्र हुई हैं?

ये स्थिति तब भी आती है जब मंदिर और मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश को लेकर समाज में तना-तनी हो जाती थी। खाप पंचायतों की महिलाओं को लेकर हुए तुगलकी फरमान किसी से छुपे नही हैं। दलित, निर्धन और अशिक्षित महिलाओं की सुध लेना वाला भी कोई नहीं है। जब शहरी आबादी ही बुरी तरह सामाजिक दुश्चक्र में फंसी हो। 

 आज की नारी किसी की मोहताज नहीं है।

आज आधा दर्जन महिलाओं को मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हो चुका है। अतीत की और वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष भी नारी समाज का गौरव बढ़ा रही हैं।पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे विश्व में महिलाओं का सम्मान बढ़ाया ही है।

आजादी के 75 सालों में तीनों सेनाओं में महिलाओं का दखल रहा है।चारो तरफ प्रशासन, पत्रकारिता, बैंक और अन्य सेवाओं में बहुत बड़ी भागीदारी है. फिर भला क्यों अक्सर ये सवाल किसी न किसी रूप में हमारे आगे मुँह बाए खड़ा हो जाता है कि महिलाओं के अधिकार क्या और कितने हो? ये महिलाओं में लाचारगी है या इस दोमुंहे समाज की बेचारगी जो महिलाओं का अस्तित्व देह से आगे स्वीकारने को तैयार नही होता।

महिलाओं ने अब तक जो भी हासिल किया भी है वो स्वयं के अनुभव आत्मविश्वास और मेहनत के आधार पर पाया है क्योंकि पुरुष समाज भी लैंगिक सोच के दायरे से बाहर नही निकला है. स्त्री को देह मानने की मानसिकता से क्या अब तक हम उबर पाये हैं. ये सवाल जब हम खुद से पूछेंगे तो निश्चित तौर पर हमें इसका जवाब मिल जायेगा।

विश्वभर की संसद में महिलाओं की संख्या के हिसाब से भारत आज भी 103वें स्थान पर हैं।

महिला आरक्षण बिल अभी भी संसद के किन्तु परन्तु के बीच अधर में अटका हुआ है। 4 साल पहले आये एक अध्ययन के मुताबिक भारत में महिलाओं की स्थिति सउदी अरब जैसे देशों से भी पिछे है।

दुनियाभर के संपन्न देशों में महिलाओं की स्थिति दर्शाने वाले इस शोध में भारत आखिरी पायदान पर खड़ा हैं। दरअसल हमारे यहां महिलाओं की स्थिति उनकी सामाजिक और आर्धिक परिस्थितियों पर निर्भर हैं. गांव और शहर की महिलाओं में तुलना करना बेमानी है. ग्रामीण महिलायें जहां आज भी अनेक वर्जनाओं और कुप्रथाओं से जूझ रही हैं।वही शहरी संभ्रांत महिलायें उचाईयों के नये आयाम गढ़ रही हैं। बेहतर तो ये होता कि कुलीन और सुशिक्षित महिलायें खुद नारी विकास की पुरजोर कोशिश करती तो संपूर्ण भारत में नारियों की दशा में परिवर्तन जरूर आता।

21वीं सदी आधी दुनिया यानी महिलाओं की सदी है. स्वतंत्र भारत में महिलाओं के उत्थान के लिए बहुत सारी योजनाओं का विकास कर रहे हैं लेकिब वो सब कही ना कही फ़ाइलों मे ही दबे रह गए।

हमें ये समझना होगा विकास और महिला उत्थान दो अलग चीज़े नही हैं। महिलाओं को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए पिछले कुछ दशकों में अभूतपूर्व प्रयास किये गये, जिससे वो आत्मनिर्भर और जागरूक हो सकें. राजग सरकार के समय यानी 2001 में महिला सशक्तिकरण वर्ष के रूप में मनाया गया. इसमें महिलाओं को सशक्त करने, उन्हें आत्मनिर्भर और जागरुक करने के अनेक प्रयास किये गए।

मै इक नारी हूं, तो क्या बोझ हूं मै।
तुम पर, परिवार पर, खुद पर ।

क्या मुझे कोई हक नही, परेशान हु मै।
तुम कहो, मै समझूं, फिर अमल करूं ।

बड़ी असमंजस में है मन, व्याकुल हूं मै ।
कुछ ख्याल, बहुत तंग करते है।
कुछ सवाल अपनी तरफ ही आड़े लाकर खड़े कर देते हैं।

फिर मेरी खामोशी का पहर चलता है।
जिस जुनून से काफिर शहर चलता है।।

प्यार में जो वक़्त गुजरा।
उसे चाहतों का अंबार लिखूँगी।।

हुआ प्यार बर्बाद वक़्त बे वक़्त।
कैसे बिखरे मेरे टूटे ख्वाब लिखूँगी।।

भावनाएं एक दूसरे को जोड़ती हैं।
बिताए उसके साथ जो पल लिखूँगी।।

मेरी भावनाओं को ना समझे मन मीत।
शुक्रिया ज़िंदगी के तजुर्बे लिखूँगी।।

उसकी खामियों को वक़्त देगा जवाब।
मैं “saira” कुछ अनकहे शब्द लिखूँगी।।

One Comment

  • बबीता वाधवानी

    नारी शिक्षित तो हो गयी पर बहुत चतुराई से तरक्की के सारे रास्ते बन्द कर दिये गये है क्योंकि नारी को दबा कुचला देखने की पुरूष वर्ग की चाहत अब भी रही इसलिए तो ड्रग्स का कारोबार फला। शिक्षित नारी का आधा जीवन बेहोशी में चला गया क्योंकि भोजन व पानी में ड्रग्स के साथ बेहोशी चली आई। बेहोश नारी कौनसे हक पा लेगी ये विचारणीय है। पता ही नहीं आधी नारी आबादी को कि वो किस अपराध की शिकार हो चली।

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