सीमाओं की तलाश भाग– 3: सहयोग

भूमिका:

इस संस्मरण के सभी पात्र और घटनाएँ वास्तविक जीवन के अनुभवों से प्रेरित हैं। आवश्यकता पड़ने पर नाम, स्थान और कुछ परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं, ताकि किसी व्यक्ति को केंद्र बनाने के बजाय कहानी का केंद्र सहयोग, संबंधों की जटिलता और उससे मिली जीवन-सीख बनी रहे।

सीमाओं की तलाश भाग–3 : सहयोग

जब दो सपनों ने एक-दूसरे का हाथ थामा, हर रिश्ता किसी न किसी कारण से शुरू होता है। लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिनका आधार केवल स्वार्थ नहीं, बल्कि साझा सपने होते हैं। हमारा रिश्ता भी कुछ ऐसा ही था। कोविड के बाद जैसे-जैसे दुनिया सामान्य होने लगी, बच्चों के लिए फिर से गतिविधियाँ शुरू होने लगीं। तभी एक दिन आस्था ने बताया कि वह बच्चों के लिए एक छोटा-सा समर कैंप आयोजित कर रही है। उस समय उसके पास बहुत कम बच्चे थे।शायद तीन या चार। मैंने बिना अधिक सोचे अपनी दोनों बेटियों को लेकर उसके घर पहुँचने का निर्णय लिया। मेरे मन में केवल एक ही भावना थी—”बच्चे घर की चारदीवारी से बाहर निकलेंगे, कुछ नया सीखेंगे, नए बच्चों से मिलेंगे और उनका बचपन थोड़ा और रंगीन होगा।”

बड़ी बेटी कुछ दिन गई, फिर उसका मन दूसरी दिशाओं में लगने लगा।लेकिन मेरी छोटी…जैसे उसे अपना एक नया संसार मिल गया।रंग…कागज़…पेंटिंग…डांस…क्राफ्ट…छोटे-छोटे खेल…मंच…हँसी…और हर दिन कुछ नया सीखने का उत्साह।

मैं उसे वहाँ छोड़कर लौटती थी तो मन में एक संतोष रहता था कि आज उसने घर की दिनचर्या से बाहर कुछ नया अनुभव किया होगा।धीरे-धीरे यह समर कैंप केवल छुट्टियों तक सीमित नहीं रहा। आस्था ने अपने इस छोटे-से प्रयास को एक पहचान दी। उसने इसका नाम रखा, “आस्थास क्रिएटिव अकैडमी।”

आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो उसकी उस यात्रा के लिए मेरे मन में आज भी सम्मान है।

एक विवाहित स्त्री…घर…परिवार…बच्चे…जिम्मेदारियाँ…और इन सबके बीच अपना एक सपना खड़ा करना आसान नहीं होता। उसने मेहनत की, लगातार की और उसी मेहनत का परिणाम था कि धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ती गई। लेकिन केवल वह ही मेहनत नहीं कर रही थी। मैं भी इस सफ़र को अपने तरीके से जी रही थी। जब भी उसे किसी कार्यक्रम के लिए प्रॉप्स चाहिए होते…मैं सोचती—”चलो, इससे बच्चों को कुछ अच्छा सीखने मिलेगा।” कभी पोस्टर बनाना होता… कभी किसी गतिविधि के लिए सामग्री जुटानी होती… कभी घर में पड़ी कोई उपयोगी चीज़ उसके काम आ सकती थी… कभी बाज़ार से कुछ खरीदकर देना होता… तो कभी अपनी रचनात्मकता से किसी विचार को आकार देना होता। वह अक्सर अचानक फोन करती, “रमन, एक आइडिया आया है… “और मैं बिना यह सोचे कि मैं उस समय क्या कर रही हूँ, उसकी पूरी बात सुनती। कई बार मेरे अपने काम बीच में छूट जाते, कई बार मेरा आराम टल जाता। लेकिन उस समय मुझे इसका हिसाब रखने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई।क्योंकि मेरे मन में एक ही विचार रहता था, “अगर इससे मेरी बेटी और दूसरे बच्चों को कुछ अच्छा सीखने मिलेगा, तो यह समय व्यर्थ नहीं है।”

मैंने कभी यह नहीं गिना कि मैंने कितना समय दिया… कितने पैसे खर्च किए… कितनी बार अपने काम रोके… कितनी बार अपने संसाधन उसके साथ बाँटे। सच्चे सहयोग का हिसाब नहीं रखा जाता।वह बस दिया जाता है और मैंने भी वही किया।

उसी दौरान मेरी छोटी बेटी भी धीरे-धीरे बदलने लगी। वह पहले से अधिक आत्मविश्वासी हुई। मंच पर जाने से डरना कम हुआ। लोगों के सामने बोलना सीखा। नृत्य सीखा। एंकरिंग सीखी। मिट्टी से खेलना सीखा। रंगों से दोस्ती करना सीखा। टीम में काम करना सीखा। अपनी बारी का इंतज़ार करना सीखा और सबसे बड़ी बात, घर से बाहर एक सामाजिक दुनिया को देखना सीखा।

इन सबके लिए मैं आज भी आस्था के प्रयासों की दिल से सराहना करती हूँ। जीवन में ईमानदारी का अर्थ केवल शिकायत करना नहीं होता। जिसने हमारे जीवन में अच्छा जोड़ा है, उसके अच्छे योगदान को स्वीकार करना भी उतना ही आवश्यक है।

हाँ…आज परिस्थितियाँ बदल चुकी हैं। रास्ते अलग हो चुके हैं। लेकिन इससे यह सच नहीं बदल जाता कि मेरी बेटी की शुरुआती शिक्षा और उसके व्यक्तित्व के विकास में आस्था का एक सकारात्मक योगदान रहा।

उसी तरह यह भी सच है कि उस पूरी यात्रा में मेरे सहयोग, मेरे विश्वास और मेरे निस्वार्थ साथ की भी अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस समय हम दोनों में से किसी ने भी हिसाब नहीं रखा। शायद इसलिए वह रिश्ता इतना सहज लगता था। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि, किसी भी रिश्ते की सबसे सुंदर अवस्था वही होती है, जब दोनों पक्ष देने में प्रसन्न हों और लेने का अहसास भी न हो।लेकिन शायद यहीं एक छोटी-सी भूल भी हुई। हम दोनों ने सहयोग तो किया…पर उसकी सीमाएँ तय नहीं की।

कई बार… सीमाओं के बिना दिया गया प्रेम, धीरे-धीरे स्वयं को भूलने लगता है। शायद हमारी कहानी भी उसी मोड़ की ओर बढ़ रही थी…

Reflection —

सहयोग और सीमा के बीच की महीन रेखा उस समय मुझे लगता था कि मैं केवल सहयोग कर रही हूँ और सच कहूँ तो मैं सहयोग ही कर रही थी। मुझे किसी पर एहसान जताना नहीं आता था, न मैंने अपने दिए हुए समय का हिसाब रखा, न अपनी मेहनत का, न अपने संसाधनों का। क्योंकि जब किसी काम के पीछे एक अच्छा उद्देश्य दिखाई देता है, तो हम अक्सर यह पूछना भूल जाते हैं कि, “मैं इसमें कितना दे रही हूँ?” हम केवल यह देखते हैं कि, “इससे कितना अच्छा हो सकता है?” शायद यही कारण था कि मैंने अपनी उपलब्धता को धीरे-धीरे सामान्य मान लिया।

एक फोन आया, मैंने समय दिया। एक काम आया, मैंने कर दिया।कोई सामग्री चाहिए थी, मैंने जुटा दी। किसी विचार को आकार देना था, मैंने अपनी रचनात्मकता लगा दी। उस समय इनमें से कुछ भी गलत नहीं था। गलती शायद कहीं और थी। मैंने यह तय नहीं किया कि सहयोग कहाँ तक है और मेरी जिम्मेदारी कहाँ से शुरू होती है।

आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो समझ आता है कि हर स्वस्थ रिश्ते में केवल विश्वास और अपनापन ही पर्याप्त नहीं होते। सीमाएँ भी चाहिए होती हैं। क्योंकि जब हम बार-बार बिना सीमा के देते हैं, तो सामने वाला हमेशा उसका दुरुपयोग करे—ऐसा ज़रूरी नहीं। कभी-कभी उसे यह एहसास ही नहीं होता कि हम कितना दे रहे हैं और कभी-कभी…हमें स्वयं भी यह एहसास नहीं होता। यही वह महीन जगह है जहाँ सहयोग, आदत बन सकता है। आदत, अपेक्षा बन सकती है और अपेक्षा धीरे-धीरे अधिकार का रूप ले सकती है।

उस समय मुझे यह दिखाई नहीं दिया। मुझे केवल अपनी बेटी की मुस्कान दिखाई देती थी और शायद किसी माँ के लिए उससे बड़ा कारण कुछ होता भी नहीं। इसलिए आज मैं उस समय को गलत नहीं कहती। मैं उस सहयोग को भी गलत नहीं कहती। लेकिन उस अनुभव से एक बात ज़रूर सीखती हूँ, “किसी के सपने को सहारा देना खूबसूरत है, लेकिन उस रास्ते पर चलते-चलते स्वयं को खो देना सहयोग नहीं, आत्म-विस्मरण है।”

शायद हमारी कहानी में सीमाओं की पहली दरार यहीं से शुरू हुई थी…जब देने में मुझे खुशी थी, लेकिन यह पूछना मैंने छोड़ दिया था कि, मेरी सीमा कहाँ है?”

— रमनदीप कौर Pearls of Words ✍🏻🌸

सीमाओं की तलाश भाग–2 : विश्वास का जन्म

Ramandeep Kaur

Founder of Pearls of Words | Writer | Psychology • Spirituality • Life

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