सीमाओं की तलाश: भाग 4 — जहाँ मैंने अपनी सीमाएँ खो दीं
भूमिका:
इस संस्मरण के सभी पात्र और घटनाएँ वास्तविक जीवन के अनुभवों से प्रेरित हैं। आवश्यकता पड़ने पर नाम और कुछ परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं। इस भाग में कहानी का केंद्र किसी दूसरे के व्यवहार पर नहीं, बल्कि मेरे अपने आत्मविश्लेषण पर है—उन सीमाओं पर जिन्हें मैंने अनजाने में पार होने दिया और उन निर्णयों पर, जिन्हें आज मैं एक नई दृष्टि से देखती हूँ।

भाग 4 — जहाँ मैंने अपनी सीमाएँ खो दीं
रिश्ते अचानक नहीं टूटते।
वे धीरे-धीरे अपनी दिशा बदलते हैं।
और कई बार ऐसा भी नहीं होता कि सामने वाला बहुत बदल गया हो…
कई बार हम स्वयं अपनी सीमाएँ (Boundaries) इतनी धीरे-धीरे हटाते जाते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि कब हमारा समय, हमारी ऊर्जा, हमारा मानसिक संतुलन और हमारी पहचान—सब किसी और की अपेक्षाओं के अधीन हो गए।
मैं आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे किसी से शिकायत करने से पहले खुद से एक प्रश्न पूछना पड़ता है—
मैं “ना” क्यों नहीं कह पाई?
शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई।
“रमन, ज़रा एक पोस्टर बना दो…”
“रमन, यह कैप्शन देख लो…”
“रमन, यह आइडिया कैसा रहेगा…”
“रमन, यह प्रॉप मिल जाएगा क्या…”
और मुझे हर बार यही लगता था कि इसमें मेरा क्या जा रहा है?
अगर मेरी छोटी-सी मदद से किसी बच्चे के चेहरे पर मुस्कान आ सकती है…
अगर किसी कार्यक्रम की सुंदरता बढ़ सकती है…
अगर मेरी बेटी भी उसी वातावरण में कुछ नया सीख रही है…
तो क्यों न कर दूँ?
धीरे-धीरे मदद मेरी आदत बन गई।
और आदत, सामने वाले का अधिकार।
मैं अपने काम छोड़कर उसके काम करने लगी।
अपनी थकान छिपाकर उसकी ज़रूरतें पूरी करने लगी।
घर की जिम्मेदारियों के बीच भी उसके संदेशों का तुरंत उत्तर देना अपनी जिम्मेदारी समझने लगी।
मैंने कभी समय नहीं देखा…
कभी यह नहीं पूछा कि मैं उस समय किस मानसिक स्थिति में हूँ…
कभी यह नहीं कहा कि “आज नहीं हो पाएगा।”
आज समझ में आता है कि दया और उपलब्धता (Availability) में बहुत बड़ा अंतर होता है।
मैं दयालु रहना चाहती थी…
लेकिन मैं हर समय उपलब्ध रहने लगी।
और यहीं मेरी पहली सीमा टूट गई।
दूसरी सीमा तब टूटी जब मैंने अपने कामों को बार-बार पीछे रखना शुरू किया।
मेरे अपने लेख…
मेरे अपने वीडियो…
मेरी वेबसाइट…
मेरे अपने सपने…
हर बार सोचती—
“यह काम बाद में कर लूँगी…”
“पहले इसका काम पूरा हो जाए…”
दिन महीनों में बदलते गए।
और महीने वर्षों में।
मुझे कभी हिसाब नहीं चाहिए था।
लेकिन आज एहसास होता है कि मैंने सबसे बड़ा नुकसान पैसों का नहीं…
अपने समय का किया।
समय वह पूँजी है जो लौटकर नहीं आती।
तीसरी सीमा भावनात्मक थी।
मैंने उसे अपने जीवन की कठिनाइयाँ भी बताईं…
अपने संघर्ष…
अपने वैवाहिक जीवन की पीड़ा…
अपने डर…
अपनी कमजोरियाँ…
मुझे लगा था कि विश्वास साझा करने से रिश्ते गहरे होते हैं।
लेकिन अब समझती हूँ—
हर अच्छा परिचित, भावनात्मक रूप से सुरक्षित व्यक्ति नहीं होता।
विश्वास भी कमाना पड़ता है।
और हर रिश्ता उस जिम्मेदारी को निभा नहीं पाता।
आज मैं किसी को दोष नहीं दे रही।
क्योंकि मेरी सबसे बड़ी सीख यही है—
जिस सीमा की रक्षा मुझे करनी थी, उसकी चाबी मैंने स्वयं दूसरों को दे दी थी।
अब मैं बदल रही हूँ।
अब मैं मदद करूँगी…
लेकिन अपनी क्षमता के भीतर।
मैं प्रेम करूँगी…
लेकिन स्वयं को खोकर नहीं।
मैं सहयोग दूँगी…
लेकिन अपने सपनों की कीमत पर नहीं।
मैं उपलब्ध रहूँगी…
लेकिन हर समय नहीं।
और सबसे महत्वपूर्ण…
अब मैं “ना” कहने को असभ्यता नहीं, बल्कि आत्मसम्मान मानती हूँ।
Reflection — जब मदद धीरे-धीरे मेरी जिम्मेदारी बन गई
कभी-कभी किसी रिश्ते में हमारी सबसे बड़ी भूल यह नहीं होती कि हमने गलत व्यक्ति पर भरोसा किया। हमारी सबसे बड़ी भूल यह होती है किहमने अपनी अच्छाई की कोई सीमा तय नहीं की। मैं मदद करना चाहती थी।
मैंने मदद की, फिर किसी दिन मुझे मदद करने के लिए कहा गया। मैंने फिर की, फिर बिना पूछे उम्मीद की जाने लगी और मैंने तब भी कर दी। धीरे-धीरे एक अजीब परिवर्तन हुआ—जो काम कभी मेरा चुनाव था,वह दूसरे की अपेक्षा बन गया और शायद उससे भी अधिक खतरनाक बात यह थी किमैंने भी उस अपेक्षा को अपनी जिम्मेदारी मान लिया। मैंने कभी यह नहीं पूछा—”क्या मैं अभी यह कर सकती हूँ?”मैंने पूछा—”इसे कैसे कर दूँ?”यही अंतर था।मैंने अपनी सुविधा नहीं देखी।अपनी थकान नहीं देखी।
अपने घर की परिस्थितियाँ नहीं देखीं। अपने बच्चों की ज़रूरतें नहीं देखीं। क्योंकि भीतर कहीं एक विश्वास बैठ गया था—”अगर मैं कर सकती हूँ, तो मुझे करना चाहिए।” आज समझती हूँ—नहीं। हर वह काम जिसे हम कर सकते हैं, करना हमारा कर्तव्य नहीं होता और हर मदद जिसे हम देने में सक्षम हैं,उसे देना आवश्यक भी नहीं होता।
कभी-कभी “अभी नहीं” कहना भी उतना ही स्वस्थ है जितना “हाँ” कहना।
🌱 मेरी दूसरी सीख —
सीमा बाहर नहीं, पहले भीतर बनती हैमैं सोचती थी कि Boundary का अर्थ है सामने वाले से कहना—”यह मत करो।” अब समझ आया कि Boundary का पहला वाक्य शायद यह होता है—”मैं यह नहीं करूँगी।” दूसरे का व्यवहार मेरे नियंत्रण में नहीं है। लेकिन—मैं कब फोन उठाऊँगी, किस काम के लिए उपलब्ध रहूँगी, कितनी व्यक्तिगत बातें साझा करूँगी, कितना समय दूँगी और कहाँ रुक जाऊँगी—यह निर्णय मेरा है। सीमा किसी दूसरे को बदलने का हथियार नहीं। वह स्वयं को बचाने का निर्णय है।
🪞 और सबसे कठिन स्वीकारोक्ति…
मुझे यह मानने में भी समय लगा किमैं केवल दूसरों से आहत नहीं हुई थी। कहीं न कहीं मैंने स्वयं को भी पीछे रखा था। हर बार जब मैंने अपनी थकान के ऊपर किसी और की जरूरत रखी, हर बार जब अपने काम को “बाद में” कहा, हर बार जब मन ने “आज नहीं” कहा और मैंने फिर भी “हाँ” कहा—मैंने अपनी ही सीमा को थोड़ा और पीछे धकेला।
इसलिए आज मेरी लड़ाई किसी व्यक्ति से नहीं है। मेरी असली लड़ाई उस पुराने स्वभाव से है, जो मुझे अच्छा इंसान बने रहने के लिएहर समय उपलब्ध रहने को मजबूर करता था। अब मैं दयालु रहूँगी।लेकिन अपनी कीमत पर नहीं। मैं सहयोग करूँगी। लेकिन अपनी पहचान खोकर नहीं। मैं प्रेम करूँगी। लेकिन स्वयं को मिटाकर नहीं।
और जब ज़रूरत होगी—मैं बिना अपराधबोध के कहूँगी: “नहीं, यह मैं नहीं कर सकती।” क्योंकि अब मुझे समझ आ गया है—सीमा वहाँ नहीं बनती जहाँ दूसरा रुकता है।सीमा वहाँ बनती है जहाँ मैं स्वयं को खोने से पहले रुक जाती हूँ।
— रमनदीप कौर Pearls of Words ✍🏻🌸
सीमाओं की तलाश भाग– 3: सहयोग