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How our Society actually deals with Feminism

नारित्व क्या केवल एक नैरा मात्र है।

इतिहास के बहुत पुराने पन्नों की तरफ नजर ना भी डालें और बस अपने ही जीवन काल में चारों दिशाओं पर देखे तो हम बहुत सी जगह पर स्त्री का पुरुष की तुलना में भेदभाव देख पाएंगे। चाहे एक ही मां से जन्मे भाई बहन हो अथवा विवाह के बाद पति-पत्नी के रूप में रह रहे हो बहुत सी चीजें ऐसी है जिनमें लोगों के व्यवहार में स्त्री और पुरुष के मध्य अंतर साफ झलकता है। पर आज की इस चर्चा में आपका ध्यान एक ही विषय की ओर केंद्रित करना चाहती हूं, अतः एक कहानी के माध्यम से अपनी बात को प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही हूं।

द्वारा:

श्रीमती रमनदीप कौर,

पटियाला पंजाब

लेखिका एवं संचालिका

podcaster “रमन की दुनिया”

एक संबंधित लघु कथा

सायमा और नरेंद्र इंटरनेट के माध्यम से एक matrimonial site पर मिले थे। नरेंद्र दिल्ली में  MBA Marketing पूरी करके अपनी पहली नौकरी कर रहे थे और सायमा जयपुर में अपने परिवार के साथ रहते हुए MBA-HR की अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रही थी। सायमा अपने माता-पिता की लाडली तो थी ही और उसके परिजनों ने उसे बहुत स्वतंत्र विचारधारा के साथ जीवन जीना सिखाया था। सायमा ने भी अपने पिता द्वारा मिली इस आज़ादी और प्रेम का सदैव पूर्ण सम्मान रखा।

कुछ दिनों तक इंटरनेट पर चैटिंग के बाद, दोनों ने एक दुसरे को और बेहतर समझने के लिए फोन पर बात करना शुरू किया और दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे। नरेंद्र को सायमा की स्वच्छंद विचारधारा बेहद पसंद आने लगी। उसका खिलखिला कर हंसना, झट से निसंकोच किसी से भी बात कर पाना और बेझिजक सही बात का समर्थन दे देना, नरेंद्र को लुभाने लगा। 

 मगर जैसे जैसे वे दोनों पास आते गए नरेंद्र का सायमा को छोटी-छोटी बातों पर ठोकना शुरू होने लगा। किसी रेस्टोरेंट पर बैठे अगर सायमा ऑर्डर देने के लिए वेटर को बुलाती तो नरेंद्र वही टोकते हुए यह कहता कि, “मेरे होते हुए तुम्हें किसी को बुलाने की जरूरत नहीं, तुम मुझे बताओ मैं खुद सब संभाल लूंगा, आगे से मेरी permission के बगैर किसी से यूंही बात नहीं करना।” 

फिर वह दिन आया जब सायमा को अपने लिए नौकरी तलाश लीजिए और उसके आगे केंपस इंटरव्यू के दौरान कुछ कंपनियों के ऑप्शन थे, तब भी नरेंद्र ने सायमा से उसकी आज्ञा के बिना कोई भी कंपनी चुनने से मना कर दिया। सायमा इस बात को भांप चुकी थी कि यदि अभी जबकि मैं इसके साथ किसी भी बंधन में नहीं हूं तब मुझे हर बात की परमिशन लेनी पड़ रही है तो बाद में जबकि मैं इनके घर में ही जाकर इन के सानिध्य में रहूंगी तब तो मैं अपने मन से कोई निर्णय ले ही नहीं पाऊंगी इसलिए सायमा ने अपने पिता से कह कर इस रिश्ते पर यहीं पूर्ण विराम लगाना ही उचित समझा।

एक और परिस्थिति

एक स्थिति ऐसी भी होती है जब कि पुरुष सीधे-सीधे शब्दों में अपनी बात नहीं कहते पर नज़रिया तो वही रहता है, जैसे आपको वह फिल्म याद है!  जिसमें प्रियंका चोपड़ा एक बहुत सफल बिज़नेस वूमेन का रोल अदा कर रही हैं और उनके पति के किरदार में राहुल बोस एक पारिवारिक समारोह में बड़ी शान से अपनी पत्नी की तारीफ करते हुए यह कहते हैं कि मैंने उसे आराम से काम करने की इजाज़त दे रखी है मुझे खुशी है कि मेरी पत्नी में यह गुण हैं इसलिए मैंने उन्हें अपने हिसाब से काम करने से कभी नहीं रोका। जी हां मैं “दिल धड़कने दो” की ही बात कर रही हूं।

जब कभी हम निर्णय को लेने में असमर्थ हो तब हम अपने मित्रों, माता पिता अथवा जीवन साथी से परामर्श करते हैं। परामर्श और इजाज़त दो अलग-अलग स्थिति है। इस चर्चा मैं मेरा बिंदु यह है कि,

  • स्त्री का हर विषय पर पुरुष से इजाज़त लेना किस हद तक सही है?
  • क्या हर बार permission लेने की प्रथा से स्त्री की मानसिक स्थिति पर असर होता है? यदि हां तो अपना कोई अनुभव शेयर करें।

Disclaimer:- इस वेबसाइट अथवा पत्रिका का उद्देश्य मनोरंजन के माध्यम से महिलाओं एवं लेखकों द्वारा लिखी रचनाओं को प्रोत्साहित करना है। यहाँ प्रस्तुत सभी रचनाएँ काल्पनिक हैं तथा किसी भी रचना का किसी भी व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि कोई रचना किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व, स्वभाव, उसकी स्थिति या उसके मन के भाव से मेल खाती हो तो उसे सिर्फ एक सयोंग ही समझा जाए। इसके अतिरिक्त प्रत्येक पोस्ट में व्यक्त गए लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं, यह जरूरी नहीं की वे विचार pearlsofwords.com या E-Magazine हर स्त्री एक “प्रेरणा” की सोच अथवा विचारों को प्रतिबिंबित करते हों। किसिस भी त्रुटि अथवा चूक के लिए लेखक स्वयं जिम्मेदार है pearlsofwords.com या E-Magazine हर स्त्री एक “प्रेरणा”की इसमें कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। 

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